नई दिल्ली। देशभर में चर्चा का विषय बने छात्र विरोध प्रदर्शनों के बीच सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) और केंद्रीय गृह मंत्रालय को पत्र लिखकर दिल्ली पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने हाल ही में आयोजित 'चलो संसद' प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारियों पर कथित पुलिस लाठीचार्ज, बल प्रयोग और पत्रकारों के साथ हुए व्यवहार की न्यायिक जांच कराने की मांग की है। साथ ही उन्होंने दिल्ली पुलिस आयुक्त को तत्काल निलंबित कर निष्पक्ष जांच कराने की भी मांग उठाई है।
विकास सिंह ने अपने विस्तृत पत्र में आरोप लगाया है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने आवश्यकता से अधिक बल प्रयोग किया, जिससे न केवल छात्र बल्कि वकील, महिलाएं, नाबालिग और पत्रकार भी प्रभावित हुए। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण विरोध प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है और ऐसे प्रदर्शनों को बलपूर्वक दबाने का प्रयास संविधान की मूल भावना के विपरीत है।
उन्होंने पत्र में विशेष रूप से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े के पुत्र के साथ हुई कथित मारपीट का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि कानून के जानकार और प्रतिष्ठित परिवारों के साथ ऐसा व्यवहार हो सकता है, तो आम नागरिकों की स्थिति का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। सिंह ने कहा कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष न्यायिक जांच आवश्यक है ताकि सच्चाई सामने आ सके और दोषी अधिकारियों की जवाबदेही तय हो।
पत्र में कई समाचार रिपोर्टों का हवाला देते हुए उन्होंने दावा किया कि प्रदर्शन के दौरान महिलाओं और नाबालिगों के खिलाफ भी बल प्रयोग किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े, दंगा नियंत्रण बल का प्रयोग किया और कई स्थानों पर प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए आवश्यकता से अधिक कठोर कार्रवाई की। उनका कहना है कि ऐसी कार्रवाई लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं कही जा सकती।
विकास सिंह ने पत्रकारों के साथ हुए कथित दुर्व्यवहार पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि कई मीडिया कर्मियों को घटनास्थल की रिकॉर्डिंग करने से रोका गया और कुछ मामलों में उनके साथ अभद्र व्यवहार तथा बल प्रयोग की शिकायतें सामने आईं। उनके अनुसार स्वतंत्र मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है और पत्रकारों को अपने कर्तव्य का निर्वहन करने से रोकना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि चिकित्सा सहायता प्रदान करने वाले स्वयंसेवकों और मानवीय सहायता में लगे लोगों के साथ भी कठोर व्यवहार किया गया। उनके अनुसार यदि राहत और चिकित्सा सेवाएं देने वाले लोगों को भी निशाना बनाया जाता है, तो यह प्रशासनिक संवेदनशीलता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
SCBA अध्यक्ष ने अपने पत्र में लिखा कि सरकारी तंत्र द्वारा प्रदर्शनकारियों का दमन, चिकित्सा सहायता देने वालों पर दबाव और पत्रकारों को घटनाओं का दस्तावेजीकरण करने से रोकना कार्यपालिका के संयम में "भयानक गिरावट" और संवैधानिक व्यवस्था के कमजोर पड़ने का संकेत है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में असहमति का सम्मान होना चाहिए और राज्य की शक्ति का उपयोग केवल कानून व्यवस्था बनाए रखने तक सीमित रहना चाहिए।
विकास सिंह ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 148 का उल्लेख करते हुए कहा कि गैरकानूनी सभा की स्थिति में भी बल प्रयोग अंतिम विकल्प होना चाहिए, न कि पहला। उनके अनुसार यदि बिना पर्याप्त कारण के बल प्रयोग किया गया है, तो यह संबंधित कानूनी प्रावधानों की भावना के विपरीत माना जाएगा। उन्होंने मांग की कि इस पहलू की भी स्वतंत्र जांच कराई जाए।
उन्होंने प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री से आग्रह किया कि पूरे घटनाक्रम की उच्च स्तरीय न्यायिक जांच कराई जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि पुलिस कार्रवाई परिस्थितियों के अनुरूप थी या नहीं। साथ ही उन्होंने उन सभी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की, जिन्होंने कथित रूप से बिना उकसावे के प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग किया।
पत्र में यह भी कहा गया कि यदि लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों के दौरान इस प्रकार की घटनाएं होती हैं और उनकी निष्पक्ष जांच नहीं होती, तो इससे आम जनता का कानून व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर विश्वास प्रभावित हो सकता है। उन्होंने कहा कि जवाबदेही तय करना लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का मूल सिद्धांत है।
इस घटनाक्रम के बाद छात्र संगठनों, अधिवक्ताओं और विभिन्न सामाजिक संगठनों के बीच भी बहस तेज हो गई है। कई संगठनों ने निष्पक्ष जांच की मांग का समर्थन किया है, जबकि प्रशासन की ओर से अब तक इस पत्र पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
फिलहाल यह मामला राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बना हुआ है। अब सभी की निगाहें केंद्र सरकार और संबंधित एजेंसियों की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं कि वे इस मांग पर क्या निर्णय लेते हैं और क्या पूरे घटनाक्रम की स्वतंत्र जांच कराई जाती है।
(नोट: यह समाचार सार्वजनिक रूप से सामने आए पत्र और उपलब्ध दावों पर आधारित है। संबंधित आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष किसी सक्षम जांच या न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही तय होगा।)
— India A To Z News

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