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कश्तियां बनीं रोजगार की पतवार: सोन नदी की लहरों पर सवार है डेहरी की अर्थव्यवस्था....

 

डेहरी ऑन सोन (रोहतास) | इंडिया A To Z News

रोहतास जिले के डेहरी ऑन सोन में बहने वाली सोन नदी अब केवल प्राकृतिक सौंदर्य का प्रतीक नहीं, बल्कि हजारों लोगों के लिए रोजगार और पर्यटन का मजबूत आधार बन चुकी है। एनीकट, झारखंडी मंदिर और मां लखपति घाट क्षेत्र में चलने वाली पारंपरिक लकड़ी की नावें स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे रही हैं। हर दिन बड़ी संख्या में पर्यटक यहां नौका विहार का आनंद लेने पहुंचते हैं, जिससे नाविकों, कारीगरों और स्थानीय दुकानदारों की आय में लगातार वृद्धि हो रही है।

लकड़ी की नावों पर आज भी कायम है भरोसा

जहां देश के कई हिस्सों में लोहे की नावों का उपयोग बढ़ा है, वहीं डेहरी के सोन तट पर आज भी मजबूत और सुरक्षित लकड़ी की नावों की ही मांग सबसे अधिक है। स्थानीय लोगों का कहना है कि लकड़ी की नावें अधिक टिकाऊ, संतुलित और आरामदायक होती हैं। यही कारण है कि पर्यटक भी इन्हीं नावों में सफर करना पसंद करते हैं। सोन नदी में तैरती ये पारंपरिक कश्तियां यहां की संस्कृति और पहचान का हिस्सा बन चुकी हैं।

10 पंजीकृत नावों से संचालित हो रहा पर्यटन

श्री श्री कृष्ण सेवा समिति घाट के पदाधिकारियों के अनुसार जिला प्रशासन द्वारा सत्यापित और पंजीकृत 10 नावों का संचालन किया जा रहा है। सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए प्रत्येक यात्री को लाइफ जैकेट पहनाई जाती है। नावें चार से छह किलोमीटर तक की सैर कराती हैं, जिसके लिए प्रति व्यक्ति 40 से 50 रुपये किराया लिया जाता है। इससे नाविकों की प्रतिदिन 400 से 600 रुपये तक की आमदनी हो जाती है, जबकि रिजर्व बुकिंग से अतिरिक्त आय भी होती है।

झारखंड के कारीगर तैयार करते हैं मजबूत कश्तियां

इन नावों के निर्माण में झारखंड के कारीगरों की महत्वपूर्ण भूमिका है। जपला निवासी एवं वर्तमान में डेहरी के शिवगंज में रहने वाले कारीगर भोला शर्मा पिछले एक दशक से लकड़ी की नावें तैयार कर रहे हैं। अब तक वे 50 से अधिक मजबूत नावें बना चुके हैं। उनके अनुसार एक बड़ी नाव तैयार करने में दो से तीन लाख रुपये तक की लागत आती है, लेकिन उच्च गुणवत्ता वाली लकड़ी से बनी ये नावें वर्षों तक सुरक्षित रहती हैं।

सैकड़ों परिवारों की आजीविका का आधार

नौका पर्यटन का लाभ केवल नाविकों तक सीमित नहीं है। बढ़ई, सहायक कारीगर, लकड़ी कारोबारी और नाव निर्माण से जुड़े अन्य लोगों की भी इससे अच्छी आय हो रही है। वहीं शाम के समय एनीकट और मां लखपति घाट पर उमड़ने वाली पर्यटकों की भीड़ से स्थानीय चाय दुकानदारों, ठेला व्यवसायियों और छोटे व्यापारियों का कारोबार भी बढ़ रहा है।

पर्यटकों को भा रहा डेहरी का प्राकृतिक सौंदर्य

आरा से आए पर्यटक सूर्याकांत यादव ने बताया कि सोन नदी का शांत वातावरण, एनीकट, झारखंडी मंदिर और सूर्य मंदिर का प्राकृतिक दृश्य उन्हें बेहद आकर्षित करता है। वहीं पर्यटक आनंद कुमार ने कहा कि सोशल मीडिया पर वीडियो देखने के बाद वे यहां पहुंचे और यहां की साफ-सफाई तथा प्राकृतिक सुंदरता ने उन्हें काफी प्रभावित किया। उनका कहना है कि प्रकृति के बीच सुकून के पल बिताने के लिए डेहरी एक बेहतरीन पर्यटन स्थल है।

बाढ़ के समय बनती हैं जीवनरक्षक नावें

सोन नदी किनारे रहने वाले लोगों के लिए ये नावें सिर्फ पर्यटन का साधन नहीं बल्कि आपदा के समय जीवनरक्षक भी साबित होती हैं। बाढ़ आने पर इन्हीं नावों के माध्यम से लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया जाता है तथा किसानों की फसलें भी खेतों से बाहर निकाली जाती हैं। मत्स्यजीवी सहयोग समिति के अनुसार अधिकांश परिवार अपनी निजी नावें तैयार रखते हैं ताकि आवश्यकता पड़ने पर उनका उपयोग किया जा सके।

व्यावसायिक नावों के लिए लाइसेंस अनिवार्य

राजस्व अधिकारी तौकीर अहमद ने बताया कि यात्रियों को ढोने वाली व्यावसायिक नावों के लिए प्रशासन द्वारा लाइसेंस जारी किया जाता है। नियमित रूप से सवारी ढोने वाली नावों का पंजीकरण, सुरक्षा जांच और गणना की जाती है। जबकि मछली पकड़ने या निजी उपयोग में आने वाली नावों के लिए यह व्यवस्था लागू नहीं होती। इस प्रणाली का उद्देश्य पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ-साथ यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

पर्यटन और रोजगार का नया मॉडल बन रहा डेहरी

सोन नदी पर आधारित नौका पर्यटन आज डेहरी ऑन सोन की पहचान बनता जा रहा है। पारंपरिक कश्तियां जहां स्थानीय संस्कृति को जीवंत बनाए हुए हैं, वहीं हजारों लोगों के लिए रोजगार का स्थायी माध्यम भी बन चुकी हैं। यदि प्रशासन पर्यटन सुविधाओं का और विस्तार करे, तो आने वाले वर्षों में डेहरी ऑन सोन बिहार के प्रमुख नदी पर्यटन केंद्रों में अपनी अलग पहचान बना सकता है।

रिपोर्ट: इंडिया A To Z News | डेहरी ऑन सोन, रोहतास

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