| बिहार: रसूख दिखाने की कोशिश पड़ी भारी, कोर्ट ने अधिकारी पर कसा शिकंजा (AI Generated Image) |
यह मामला एडीजे-4 अनिल कुमार की अदालत में सुनवाई के दौरान सामने आया। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि संबंधित अधिकारी ने न सिर्फ अपने कर्तव्यों में लापरवाही बरती, बल्कि खुद को एक प्रभावशाली विधायक का दामाद बताकर अदालत पर धौंस जमाने की भी कोशिश की। इस रवैये पर अदालत ने कड़ी नाराजगी जाहिर की।
दरअसल, मामले की पिछली तारीख पर रोहतास के समाहर्ता (डीएम) द्वारा स्थगन आदेश प्रस्तुत नहीं किया जा सका था। इस पर कोर्ट ने पहले समाहर्ता पर ₹10,000 का जुर्माना लगाया था। लेकिन जब मामले की गहराई से जांच की गई, तो यह सामने आया कि असली चूक समाहर्ता की नहीं, बल्कि विधि प्रशाखा पदाधिकारी की थी, जिसने समय पर आवश्यक दस्तावेज कोर्ट में पेश नहीं किए।
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि अधिकारी ने अपनी गलती छिपाने और मामले को प्रभावित करने के लिए खुद को विधायक का दामाद बताकर दबाव बनाने की कोशिश की। इस पर कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि न्यायालय में इस तरह का आचरण कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
इसके बाद अदालत ने अपना पूर्व आदेश संशोधित करते हुए समाहर्ता पर लगाए गए जुर्माने को रद्द (विलोपित) कर दिया और वही जुर्माना सीधे संबंधित विधि प्रशाखा पदाधिकारी पर लगा दिया। कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया कि ₹10,000 की यह राशि अधिकारी के वेतन से काटकर न्यायालय में जमा कराई जाए।
अदालत के इस फैसले को न्यायिक सख्ती और जवाबदेही की मिसाल माना जा रहा है। यह संदेश भी साफ है कि सरकारी पद पर बैठे अधिकारियों को अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन करना होगा और किसी भी प्रकार की लापरवाही या दबाव की राजनीति को अदालत बर्दाश्त नहीं करेगी।
👉 निष्कर्ष:
इस पूरे घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया कि कानून के सामने सभी बराबर हैं। चाहे कोई कितना भी रसूखदार क्यों न हो, न्यायालय में अनुशासन और जिम्मेदारी से समझौता नहीं किया जा सकता।
(India A to Z News के लिए विशेष रिपोर्ट)
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