| राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा (मध्य) ने संदीप पाठक (बाएं) और अशोक मित्तल (दाएं) के साथ आम आदमी पार्टी छोड़कर बीजेपी में जाने का एलान किया |
नई दिल्ली/चंडीगढ़: देश की राजनीति में उस वक्त बड़ा भूचाल आ गया जब राघव चड्ढा ने आम आदमी पार्टी छोड़ने और भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने का ऐलान कर दिया। चड्ढा ने दावा किया कि उनके साथ राज्यसभा के छह अन्य सांसद भी पार्टी छोड़ चुके हैं, जिससे ‘आप’ को बड़ा झटका लगा है।
क्या है पूरा मामला?
राघव चड्ढा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि पार्टी के अंदर लंबे समय से असंतोष था और अब कई नेता एक साथ नया रास्ता चुन रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि उनके साथ स्वाति मालीवाल, राजेंद्र गुप्ता, विक्रम साहनी और हरभजन सिंह सहित अन्य सांसद भी पार्टी से अलग हो गए हैं।
बताया जा रहा है कि ये सभी नेता बीजेपी दफ्तर पहुंचे और औपचारिक रूप से पार्टी में शामिल होने की प्रक्रिया शुरू की।
राज्यसभा गणित पर असर
राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के कुल 10 सांसद थे। यदि सात सांसद एक साथ पार्टी छोड़ देते हैं, तो दल-बदल कानून (Anti-Defection Law) के तहत यह कदम वैध माना जा सकता है क्योंकि यह दो-तिहाई से अधिक संख्या है। ऐसे में ‘आप’ के पास राज्यसभा में सिर्फ तीन सांसद ही बचेंगे।
केजरीवाल का तीखा हमला
इस पूरे घटनाक्रम पर अरविंद केजरीवाल ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा:
“बीजेपी ने एक बार फिर पंजाबियों के साथ धक्का किया है।”
उनका संकेत साफ था कि यह राजनीतिक चाल पंजाब की राजनीति को प्रभावित करने के लिए चली गई है, जहां आम आदमी पार्टी की सरकार है।
संजय सिंह ने बताया ‘गद्दारी’
संजय सिंह ने भी इस घटनाक्रम को लेकर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा:
“राघव चड्ढा को पार्टी ने विधायक बनाया, सांसद बनाया, और अब वो बीजेपी में चले गए। यह पंजाब के साथ धोखा है।”
उन्होंने आगे कहा कि जनता ऐसे नेताओं को कभी माफ नहीं करेगी।
पंजाब की राजनीति पर असर
यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब पंजाब में अगले साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में पार्टी के बड़े नेताओं का एक साथ जाना ‘आप’ के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
क्या ‘आप’ में सब कुछ ठीक नहीं?
इस घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या आम आदमी पार्टी के भीतर अंदरूनी कलह चल रही थी? क्या नेतृत्व से नाराजगी इतनी बढ़ गई थी कि नेताओं को पार्टी छोड़नी पड़ी?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सिर्फ दल-बदल नहीं, बल्कि आने वाले चुनावों से पहले बड़ा राजनीतिक खेल हो सकता है।
संकेत पहले से मिल रहे थे
यह पहली बार नहीं है कि राजनेताओं ने आम आदमी पार्टी को छोड़ा है. हालांकि यह पहली बार है कि सात सांसदों के एक साथ पार्टी छोड़ने की चर्चा हो रही है.
अरविंद केजरीवाल ने जब भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ चले आंदोलन के बाद पार्टी का गठन किया था तब से पार्टी के साथ जुड़े कई बड़े लोग पार्टी छोड़कर गए हैं.
पार्टी पर नज़र रखने वाले विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी इस घटनाक्रम को झटका तो ज़रूर लगा है लेकिन इसका पार्टी पर कोई ख़ास असर नहीं होगा.
लंबे समय से आम आदमी पार्टी को कवर कर रहे विक्रांत यादव कहते हैं, "आम आदमी पार्टी को लग रहा है कि राज्यसभा सांसदों के बीजेपी में जाने को वह आगामी चुनावों में एक भावनात्मक मुद्दे की तरह इस्तेमाल कर सकेगी."
यह सवाल भी है कि क्या इतनी बड़ी तादाद में सांसदों के पार्टी को छोड़ने की आम आदमी पार्टी नेताओं को भनक तक नहीं लगी?
आम आदमी पार्टी ने इसे बीजेपी का 'ऑपरेशन लोटस' बताया है.
पत्रकार विक्रांत यादव कहते हैं, "हमें जानकारी मिली है कि आम आदमी पार्टी को कल ही ये संकेत मिल गए थे कि कई सांसद पार्टी छोड़ सकते हैं. हालांकि पार्टी ने जब इन सांसदों से संपर्क करने की कोशिश की तो बात नहीं हो सकी."
बीबीसी से बात करते हुए भी आम आदमी पार्टी के एक सक्रिय कार्यकर्ता ने संकेत दिया कि पार्टी को कई सांसदों के छोड़कर जाने के संकेत मिल रहे थे.
आम आदमी पार्टी ने हाल ही में राघव चड्ढा की जगह अशोक मित्तल को राज्यसभा में पार्टी का उप-नेता बनाया था. इस घटनाक्रम के बाद से ही राघव चड्ढा और पार्टी के बीच दूरी नज़र आ रही थी.
बीते 15 अप्रैल को जब अशोक मित्तल के कारोबारी ठिकानों पर प्रवर्तन निदेशालय की रेड हुई तब आम आदमी पार्टी विधायक सौरभ भारद्वाज ने कहा था कि इस कार्रवाई के पीछे राघव चड्ढा का हाथ है.
विश्लेषक अब इस बात से हैरान हैं कि अशोक मित्तल भी राघव चड्ढा के साथ चले गए हैं.
'नेतृत्व से नाराज़गी नहीं, असली कारण कुछ और'
India A To Z News को पता चला है कि प्रवर्तन निदेशालय की रेड के बाद अशोक मित्तल से जुड़े कार्यकर्ताओं ने उनके और राघव चड्ढा के बीच टकराव दिखाने और रेड को राघव चड्ढा से जोड़ने की कोशिश की थी.
ऐसे में सवाल उठता है कि राघव चड्ढा के साथ अशोक मित्तल ने भी पार्टी क्यों छोड़ दी?
वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री इसे प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई से जोड़कर देखते हैं.
हेमंत अत्री कहते हैं, "अशोक मित्तल राघव चड्ढा के साथ प्रेस कॉन्फ़्रेंस में शामिल हुए और फिर बीजेपी मुख्यालय पहुंचे. यह वही अशोक मित्तल हैं जिनके ठिकानों पर दस दिन पहले प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कार्रवाई चल रही थी. क्या अब आगे भी उन पर कार्रवाई होगी?"
लंबे समय से आम आदमी पार्टी पर नज़र रखने वाले पत्रकार मुकेश केजरीवाल को लग रहा है कि अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसौदिया, सत्येंद्र जैन और अन्य नेताओं के जेल जाने के बाद पार्टी के कई नेताओं में डर रहा होगा कि कहीं वह भी ऐसी ही कार्रवाई का निशाना न बन जाएं.
मुकेश केजरीवाल कहते हैं, "आम आदमी पार्टी ने जिन लोगों को नेता बनाया वह भी साधारण लोग ही साबित हुए. या तो वो किसी लालच में आए या एजेंसियों की कार्रवाई से डर गए."
हालांकि, पार्टी छोड़ने के बाद राघव चड्ढा ने कहा है कि आम आदमी पार्टी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ होने के अपने सिद्धांत से भटक गई है. उन्होंने कहा, "मैं उनकी दोस्ती के क़ाबिल नहीं था क्योंकि मैं उनके ग़ुनाह में शामिल नहीं था."
चड्ढा ने कहा, "जिस पार्टी को मैंने अपने खून-पसीने से सींचा और अपनी जवानी के 15 साल दिए, वह आज पूरी तरीके से अपने सिद्धांतों, मूल्यों और कोर मॉरल से भटक चुकी है."
हालांकि, विक्रांत यादव को लगता है कि सांसदों के पार्टी छोड़ने के पीछे सिर्फ़ नेतृत्व से नाराज़गी होने के तर्क नहीं हो सकता.
वह कहते हैं, "यदि पार्टी के भीतर नाराज़गी होती तो अशोक मित्तल जैसे नेता, जिन्हें अभी उप-नेता बनाया गया था, पार्टी छोड़कर नहीं जाते. असली कारण कुछ और ही हो सकते हैं."
मुकेश केजरीवाल यह भी याद दिलाते हैं कि जब अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री थे तब पंजाब में राघव चड्ढा को सक्रिय भूमिका दी गई थी और एक तरह से राज्य में पार्टी वही चला रहे थे.
लेकिन पिछले कुछ महीनों से उन्हें पार्टी में सक्रिय भूमिका से अलग कर दिया गया था और अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया पंजाब में अधिक सक्रिय हो गए थे.
मुकेश केजरीवाल कहते हैं, "राघव चड्ढा को लग रहा था कि पार्टी ने उन्हें किनारे कर दिया है, उन्हें पार्टी में अपना कोई भविष्य नज़र नहीं आ रहा था. लेकिन सवाल यह है कि वह बीजेपी में जाकर क्या हासिल कर लेंगे? क्या बीजेपी में उन्हें वह अहमियत मिल पाएगी जो आम आदमी पार्टी में हुआ करती थी?"
'सवाल केजरीवाल पर भी उठेंगे'
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